Friday, April 11, 2014

मुक्ति (Liberation)

पहली बार पंकज अवस्थी की आवाज़ में जब यह बोल सुने तो फ़ोन के स्क्रीन पर उंगलियाँ ठिठक सी गयीं।

दिल से कुछ भी लिखा जाए तो भारी शब्दों के प्रयोग और उनके एलाइनमेंट की ज़रुरत नहीं पड़ती। भावनाएं अपने आप उभर आती हैं और रचना अपने आप सुन्दर बन जाती है।  बस समय देना पड़ता है, जो आज हम सबके पास ज़रा कम है।  पता नहीं दिनभर ऐसा क्या करतें हैं हम।

फिलहाल इन बातों को एक तरफ रखते हैं और गाने का लुत्फ़ उठाते हैं।



एक दिन झाड़ दूंगा धूल 
कर्मों की, विचारों की 
सपनो की 

फेंक दूंगा लगाव 
किताबों से 
आमों से 
कुछ ख़ास लोगों से 

दरकिनार कर बैठूंगा चिंताएं 
परिवार की, समाज की 
जगत की 

छुट्टी पा लूंगा
कष्टों से, बिमारी से 
मौसमों और, बेमौसम की

छोड़ दूंगा सब 
तरह तरह की शंकाएं 
हर तरह की आशाएं 
दोनों जहां के झगडे 
रोज़ रोज़ के लफ़ड़े 

ख़त्म कर दूंगा 
आदि अनादि के विवाद 
व्यर्थ के संवाद 
प्रेम कहानियां 
दुश्मनी की गालियां 

सब झंझटों से मुक्त हो जाऊंगा 
बस अपने में ही मस्त हो जाऊँगा 
न जवाब दूंगा 
कोई भी कुछ कहे 

लोग कहेंगे -
मिश्राजी नहीं रहे