एक 'Hindi' post...

सालों से हिन्दी में एक पोस्ट पब्लिश करने की इच्छा थी।इन्फेक्ट, एक नहीं; कई।पर अब हिन्दी में लिखने की आदत ही नहीं रही। शायद इस पोस्ट से कुछ हद तक यह इच्छा पूरी होगी।

बारहवीं क्लास में जो हिन्दी पढ़ी, वो अब तक याद है। एक मोटी-पतली सी किताब थी।उसमें कुछ कहानियाँ, कविताएँ, एकांकी और निबन्ध थे। प्रेमचंद थे, महादेवी वर्मा थीं, हरिशंकर परसाई, सूर्यकांत त्रिपाठी (निराला) भी - शायद। गणित से ज़्यादा अंक मेरे हिन्दी में आते थे। पर साइंस स्ट्रीम में हिन्दी की किसको पड़ी थी।उस समय हम सब इंजीनियरिंग-मेडिकल के चक्करों में फंसे हुए थे। डिफरेंशियल कैलकुलस और क्वांटम मैकेनिक्स पसंद नहीं आता था, पर इनको पढने/रटने  के अलावा और कोई चारा न था।  

इंजीनियरिंग में जब डायरी लिखना शुरू किया था, तब काफी कुछ हिन्दी में लिखा करता था। एक-आध बार तैश में आकर कविताएँ भी लिख डालीं थीं। एवरेज सी कवितायें थीं, सुनाने लायक तो बिलकुल नहीं।उन दिनों लिखना भी हिंदी में ही हुआ करता था। जैसे जैसे समय बीतता गया, वैसे वैसे लिखाई अंग्रेज़ी में बढ़ती  गयी, और भाषा हिन्दी-अंग्रेज़ी की खिचड़ी जैसी हो गयी  -
Something like this, jismein English and Hindi - dono ka mila jula form rehta hai. 
यह सब कुछ  नौ सालों तक चला। करीबन साढ़े तीन साल पहले डायरी को आखरी सलाम दिया गया।और फिर उसके बाद बचा-खुचा हिन्दी लिखने से नाता भी टूट गया। इन्फेक्ट, लिखने से ही नाता टूट गया।अब कागज़ और कलम सिर्फ शौकिया चीज़ें बन कर रह गयीं हैं। टाइप करना ज्यादा आसन पड़ता है। बोलने में आज भी हिन्दी का प्रयोग जारी है। पर यह हिन्दी जुगाड़ है। कई प्रान्तों में रहने के बाद भाषा और भाषान्तर पैरेलल प्रोसेस बन जाते हैं।  ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ है। शायद ऐसा सबके साथ हो रहा है।

हिंदी हमारी संस्कृति का हिस्सा है - ऐसा मेरा मानना नहीं है। जो हाल संस्कृत का हुआ है, कुछ वैसा हिंदी के साथ भी होगा। ये कोई चिंताजनक विचार नहीं है। ये बदलाव है। रोकेंगे तो भी नहीं रुकेगा।कुछ नया आएगा, एक नयी भाषा बनेगी - और कुछ अरसे बाद वह भी भूली बिसरी हो जायेगी। तब तक मेरी तरफ से ऐसी कुछ पोस्ट्स आती रहें - खुद से बस उतनी ही आशा है।

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